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बिल्वपत्र की महत्ता

🍃🍃 बिल्वपत्र की महत्ता 🍃🍃      🍃🍃हरि ॐ नम: शिवाय🍃🍃     ~-~-~-~-~-·····~-~-~-~-~- ★शिव पुराण के अनुसार शिवलिंग पर कई प्रकार की सामग्री फूल-पत्तियां चढ़ाई जाती हैं। इन्हीं में से सबसे महत्वपूर्ण है बिल्वपत्र। बिल्वपत्र से जुड़ी खास बातें जानने के बाद आप भी मानेंगे कि बिल्व का पेड बहुत चमत्कारी है--- ●पुराणों के अनुसार रविवार के दिन और द्वादशी तिथि पर बिल्ववृक्ष का विशेष पूजन करना चाहिए। इस पूजन से व्यक्ति ब्रह्महत्या जैसे महापाप से भी मुक्त हो जाता है। ●क्या आप जानते हैं कि बिल्वपत्र छ: मास तक बासी नहीं माना जाता। इसका मतलब यह है कि लंबे समय तक शिवलिंग पर एक बिल्वपत्र धोकर पुन: चढ़ाया जा सकता है या बर्फीले स्थानों के शिवालयों में अनुपलब्धता की स्थिति में बिल्वपत्र चूर्ण भी चढाने का विधान मिलता है। ●आयुर्वेद के अनुसार बिल्ववृक्ष के सात पत्ते प्रतिदिन खाकर थोड़ा पानी पीने से स्वप्न दोष की बीमारी से छुटकारा मिलता है। इसी प्रकार यह एक औषधि के रूप में काम आता है। ●शिवलिंग पर प्रतिदिन बिल्वपत्र चढ़ाने से सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। भक्त को जीवन में ...

Janmashtmi vishe

जन्माष्टमी पर आज एक साथ तीन संयोग! ********************************** स्मार्त समुदाय आज और वैष्णव समुदाय कल मनाएगा जन्माष्टमी ================================ अधिकतर श्रद्धालु आज यानी 23 अगस्त को जन्माष्टमी मनाएंगे। स्मार्त अर्थात् पंचदेवों की पूजा करने वाले श्रद्धालु 23 अगस्त को जन्माष्टमी का व्रत रखेंगे। वैष्णव समुदाय के श्रद्धालु अवश्य कल यानी 24 अगस्त को जन्माष्टमी पर्व मनाएंगे। जन्माष्टमी पर ग्रह गोचरों का महासंयोग वरदान होगा। इस तिथि पर छत्र योग, सौभाग्य सुंदरी योग और श्रीवत्स योग बन रहा है। यह पर्व पूजन और व्रतियों के लिए फलदायी सिद्ध होगा। 14 वर्षों के बाद तीन संयोग एक साथ बने हैं। जन्माष्टमी के समय सूर्यदेव अपनी सिंह राशि में रहेंगे। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद यानी कि भादो माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था, जो कि इस बार 23 अगस्त को पड़ रही है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था, इसलिए जन्माष्टमी रोहिणी नक्षत्र में मनाया जाना सर्वोत्तम माना गया है। रोहिणी नक्षत्र 23 अगस्त 2019 रात 11.56 बजे से ही शुरू हो जाएगा। 23 अगस्त को रोहिणी नक...

ऋण मोचन मंगल स्तोत्र ।।

ऋणमोचन मंगल स्तोत्र मंगलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रद:। स्थिरामनो महाकाय: सर्वकर्मविरोधक:।। लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां। कृपाकरं। वैरात्मज: कुजौ भौमो भूतिदो भूमिनंदन:।। धरणीगर्भसंभूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्। कुमारं शक्तिहस्तं च मंगलं प्रणमाम्यहम्। अंगारको यमश्चैव सर्वरोगापहारक:। वृष्टे: कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रद:।। एतानि कुजनामानि नित्यं य: श्रद्धया पठेत्। ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्रुयात् ।। स्तोत्रमंगारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभि:। न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित्।। अंगारको महाभाग भगवन्भक्तवत्सल। त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय:।। ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये ह्यपमृत्यव:। भयक्लेश मनस्तापा: नश्यन्तु मम सर्वदा।। अतिवक्र दुराराध्य भोगमुक्तजितात्मन:। तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्।। विरञ्चि शक्रादिविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा। तेन त्वं सर्वसत्वेन ग्रहराजो महाबल:।। पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गत:। ऋणदारिद्रयं दु:खेन शत्रुणां च भयात्तत:।। एभिद्र्वादशभि: श्लोकैर्य: स्तौति च धरासुतम्। महतीं श्रियमाप्...

पूजा से जुड़ी बातें

🙏 *જય ભગવાન* 🙏 🕉 *નમો નારાયણ* 🕉 ☘ *સનાતન ધર્મ વિશે* ☘ *।।पूजा से जुड़ी हुईं अति महत्वपूर्ण बातें।।* ★ एक हाथ से प्रणाम नही करना चाहिए। ★ सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए। ★ बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करें। ★ जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं। इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं। ★ जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए। ★ जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए। ★ संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं। ★ दीपक से दीपक को नही जलाना चाहिए। ★ यज्ञ, श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं। ★ शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाना चाहिए। पीपल की सात परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा करना श्रेष्ठ है, ★ कूमड़ा-मतीरा-नारियल आदि को स्त्रियां नहीं तोड़े या चाकू आदि से नहीं काटें। यह उत्तम नही माना गया हैं। ★ भोजन प्रसाद को लाघंना नहीं चाहिए। ★...

નાડાછડી

🙏 *જય ભગવાન* 🙏 🕉 *નમો નારાયણ* 🕉 🔥  *સત્ય સનાતન ધર્મ કી જય હો*🔥 🕉 *જય શ્રી કૃષ્ણ* 🕉  🌺 *નાડાછડી* 🌺 🧶કોઈપણ દેવી-દેવતાની પૂજામાં બ્રાહ્મણ દ્વારા આપણા કાંડા પર એક વિશેષ દોરો બાંધવામાં આવે છે.  જેને નાડાછડી  કહેવામાં આવે છે. આ દોરાને બાંધવાથી ધર્મ લાભ ઉપરાંત સ્વાસ્થ્ય લાભ પણ મળે છે. આવો આજે જાણીએ કે પૂજામાં લાલ દોરો કેમ બાંધવામાં આવે છે અને તેના શુ સ્વાસ્થ્ય થાય  છે.   🧶હાથ પર જ્યા લાલ દોરો બાંધવામાં આવે છે. ડોક્ટર પણ એ જ સ્થાન પર નાડી તપાસીને બીમારી વિશે બતાવે છે.  લાલ દોરો બાંધતી વખતે આપણા કાંડા પર દબાણ પડે છે.  જેનાથી ત્રિદોષ મતલબ વાત, પિત્ત અને કફ નિયંત્રણમાં રહે છે.   🧶નાડાછડીના સંબંધમાં માન્યતા છે કે તેને બાંધવાથી ત્રિદેવ મતલબ બ્રહ્મા, વિષ્ણુ, મહેશ અને ત્રણેય દેવીઓ મતલબ લક્ષ્મી, પાર્વતી અને સરસ્વતીની વિશેષ કૃપા પ્રાપ્ત થાય છે.   🧶બ્રહ્માકી કૃપાથી કીર્તિ, વિષ્ણુની કૃપાથી બળ મળે છે અને શિવજી આપણા દુર્ગુણોનો નાશ કરે છે.  આ જ રીતે લક્ષ્મીથી ધન, દુર્ગાથી શક્તિ અને સરસ્વતીની કૃપાથી બ...

दक्षिणा मूर्ति स्तोत्रम्। जय गुरुदेव

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विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरी तुल्यं निजान्तर्गतम्, पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यदा निद्रया। यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयम्, तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥१॥यह विश्व दर्पण में दिखाई देने वाली नगरी के समान है (अर्थात् अवास्तविक है),  स्वयं के भीतर है, मायावश आत्मा ही  बाहर प्रकट हुआ सा दिखता है  जैसे नींद में अपने अन्दर देखा गया स्वप्न बाहर उत्पन्न हुआ सा दिखाई देता है।जो आत्म-साक्षात्कार के समय यह ज्ञान देते हैं कि आत्मा एक (बिना दूसरे के) है उन श्रीगुरु रूपी, श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है ॥१॥This world is unreal like the image of a city in the mirror, it exists inside. Due to the power of Maya it looks as if it is manifested outside like in dream we see things outside ourselves. Salutations to Sri Shiva in the form of preceptor, who, at the time of self realization, makes one aware that Atma is without second (i.e. one).॥1॥   बीजस्यान्तरिवान्कुरो जगदिदं प्राङनिर्विकल्पं पुन- र्मायाकल्पितदेशकालकलना वैचित्र्यचित्री...

गुरु पूर्णिमा विशेष

गुरुदेव वे हैं, जो साधना बताते हैं, साधना करवाते हैं एवं आनंदकी अनुभूति प्रदान करते हैं । गुरुका ध्यान शिष्यके भौतिक सुखकी ओर नहीं, अपितु केवल उसकी आध्यात्मिक उन्नतिपर होता है । गुरु ही शिष्यको साधना करनेके लिए प्रेरित करते हैं, चरण दर चरण साधना करवाते हैं, साधनामें उत्पन्न होनेवाली बाधाओंको दूर करते हैं, साधनामें टिकाए रखते हैं एवं पूर्णत्वकी ओर ले जाते हैं । गुरुके संकल्पके बिना इतना बडा एवं कठिन शिवधनुष उठा पाना असंभव है । इसके विपरीत गुरुकी प्राप्ति हो जाए, तो यह कर पाना सुलभ हो जाता है । श्री गुरुगीतामें ‘गुरु’ संज्ञाकी उत्पत्तिका वर्णन इस प्रकार किया गया है, गुकारस्त्वन्धकारश्च रुकारस्तेज उच्यते । अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः ।। – श्री गुरुगीता अर्थ : ‘गु’ अर्थात अंधकार अथवा अज्ञान एवं ‘रु’ अर्थात तेज, प्रकाश अथवा ज्ञान । इस बातमें कोई संदेह नहीं कि गुरु ही ब्रह्म हैं जो अज्ञानके अंधकारको दूर करते हैं । इससे ज्ञात होगा कि साधकके जीवनमें गुरुका महत्त्व अनन्य है । इसलिए गुरुप्राप्ति ही साधकका प्रथम ध्येय है । गुरुप्राप्तिसे ही ईश्वरप्राप्ति होती है अथवा यूं कहें कि ...