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Puja path ma achman nu mahatv

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पूजा पाठ में आचमन का महत्त्व 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ पूजा, यज्ञ आदि आरंभ करने से पूर्व शुद्धि के लिए मंत्र पढ़ते हुए जल पीना ही आचमन कहलाता है। इससे मन और हृदय की शुद्धि होती है।    । यह जल आचमन का जल कहलाता है। इस जल को तीन बार ग्रहण किया जाता है। माना जाता है कि ऐसे आचमन करने से पूजा का दोगुना फल मिलता है।  जल लेकर तीन बार निम्न मंत्र का उच्चारण करते हैं:- हुए जल ग्रहण करें- ॐ केशवाय नम:  ॐ नाराणाय नम: ॐ माधवाय नम: ॐ ह्रषीकेशाय नम:, बोलकर ब्रह्मतीर्थ (अंगुष्ठ का मूल भाग) से दो बार होंठ पोंछते हुए  हस्त प्रक्षालन करें (हाथ धो लें)। उपरोक्त विधि ना कर सकने की स्थिति में केवल दाहिने कान के स्पर्श मात्र से ही आचमन की विधि की पूर्ण मानी जाती है।   आचमन करते समय हथेली में 5 तीर्थ बताए गए हैं- 1. देवतीर्थ, 2. पितृतीर्थ, 3. ब्रह्मातीर्थ, 4. प्रजापत्यतीर्थ और 5. सौम्यतीर्थ।   कहा जाता है कि अंगूठे के मूल में ब्रह्मातीर्थ, कनिष्ठा के मूल प्रजापत्यतीर्थ, अंगुलियों के अग्रभाग में देवतीर्थ, तर्जनी और अंगूठे के बीच पितृतीर्थ और हाथ के मध्य भाग में सौम्यतीर्थ हो...

सिद्धों के दर्शन एवं अनुदान।। शास्त्री जी भावनगर।।

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सिद्धों के दर्शन व अनुदान सिद्ध सूक्ष्म शरीर धारी होते हैं। स्थूल शरीर की एक सीमा मर्यादा है। भारत की जलवायु में सौ वर्ष की आयु को पूर्ण माना गया है। “जीवेम शरदः शतम्” आदि वेद मन्त्रों में इसी तथ्य का रहस्योद्घाटन किया गया है। आशीर्वादों में सौ वर्ष तक जीवित रहने की कामना की जाती है। कभी-कभी कहीं-कहीं कुछ लोग अधिक समय भी जीवित रहते देखे गये हैं। पर वे अपवाद हैं। अपवाद तो किसी भी क्षेत्र में दृष्टिगोचर हो सकते हैं। सिद्ध बहुधा हिमालय क्षेत्र में निवास करते हैं। जहाँ शीत की प्रधानता होती है। उस क्षेत्र का अधिकांश भाग बर्फ से ढका रहता है। जो हिमि प्रदेश के जीव-जन्तु हैं, वो तो गुफाओं में जाकर गहरी निद्रा में सो जाते हैं और जब बसन्त आता है और आहार तथा जल की व्यवस्था हो जाती है तो नींद खुलती है और बाहर निकलते हैं। यह हिमानी प्राणियों के लिए प्रकृति की विशेष व्यवस्था है। मनुष्य शरीर की संरचना ऐसी नहीं है। उसे अन्न जल ही नहीं आग जलाने के लिए ईंधन की भी व्यवस्था करनी पड़ती है। इसके अतिरिक्त मल-मूत्र त्यागने एवं आच्छादन की भी। वह सामान्यतया बन नहीं पाता। इसलिए बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, जमुन...

महा दारिद्र्य नाशक कृतिका नक्षत्र युक्त सोमवार

*महादारिद्रय नाशक कृत्तिका नक्षत्र युक्त सोमवार....* *02 मे 2022 को वैशाख  मास का कृत्तिका नक्षत्र युक्त सोमवार है।* शिवपुराण विश्वेश्वरसंहिता अध्याय 16 के अनुसार... कृत्तिकासोमवारेषु शिवस्य यजनं नृणाम् ॥ महादारिद्र्यशमनं सर्वसंपत्करं भवेत् ॥ गृहक्षेत्रादिदानाच्च गृहोपकरणादिना ॥ कृत्तिका नक्षत्र से युक्त सोमवारों को किया हुआ शिवजी का पूजन मनुष्यों के महादारिद्र को मिटाने वाला और संपूर्ण संपत्तियों को देने वाला हैं। घर की आवश्यक सामग्रियों के साथ गृह और क्षेत्र आदि का दान करने से भी उक्त फल की प्राप्ति होती है। लिङ्गपुराण के अनुसार चंद्र की उत्पत्ति कृत्तिका में ही हुई थी अतः इसको चंद्र का जन्म नक्षत्र माना जाता है।  “ शीतरश्मिः समुत्पन्नः कृत्तिकासु निशाकरः ” शिवपुराण, विश्वेश्वरसंहिता में सोम (चन्द्र) को संपत्तियों का दाता कहा है. “ आरोग्यं संपदश्चैव व्याधीनां शांतिरेव च ” कालपुरुष की कुंडली में चंद्र चतुर्थ भाव के स्वामी होकर द्वितीय भाव में (अपने से ग्यारहवें) उच्च के होते हैं। इसका अर्थ है सम्पत्ति के लिए परम आवश्यक है प्राप्ति, लाभ, सिद्धि, पूर्णता।  हमारे शास्त्रों ...

દ્વારકા

🚩 *श्री जी धर्मक्षेत्र* 🚩 *श्रीद्वारका जी महिमा* इस अध्याय में:- (शंखोद्धारतीर्थ  की महिमा)           मार्कण्डेयजी कहते हैं- महाभारत में कौरव सेना के मारे जाने और समस्त योद्धाओं के नष्ट हो जाने पर  अर्जुन भक्ति भाव से श्रीकृष्ण के समीप गये और उनकी परिक्रमा तथा प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले- 'भगवन्! शंखोद्धार तीर्थ का फल बताइये।'           श्रीभगवान् बोले- 'महाबाहो! जो मनुष्य घर में रहकर भी शंखोद्धार तीर्थ का स्मरण करते हैं, उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती। जो शंखोद्धार तीर्थ में जाकर मन-ही-मन भगवान् शंखधर का स्मरण करते हैं, वे विष्णुलोक में निवास पाते हैं। जो शंखोद्धार तीर्थ का दर्शन करता है, वह स्वर्गलोक को जाता है। अर्जुन ! यदि शंखोद्धार की यात्रा करने वाला मनुष्य मार्ग में ही मर जाय और शंखोद्धार का दर्शन न कर सके तो वह भी मुझे वैसा ही प्रिय है, जैसी कि लक्ष्मी हैं। मनुष्य को अपने घर में रहते हुए भी शंखोद्धार तीर्थ और शंखधारी भगवान् विष्णु का स्मरण करना चाहिये। करोड़ों सूर्यग्रहणों के समय सरस्वती तीर्थ में जो फल होता है, वही आधे प...

what's is Puja?

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Puja is ritualistic worship of the Divine performed to keep us in harmony with cosmic forces, thereby removing and overcoming the sorrows of life and bringing spiritual upliftment. By doing puja, thoughts and vibrations of spiritual forces are created around us. These spiritual forces work to eliminate the negative influences in our life and help surround us with positive energy which can bring us peace of mind, material prosperity and enable us to more clearly touch the Divine, our true nature. Pujas are traditionally performed in temples by residing priests trained in the exact science of puja including the precise details of auspicious times to do certain pujas, which mantras to chant, etc. An individual's vedic astrological chart determines which pujas and timings are best for that person, based on their karma from this life and previous lives. The periods when the results of our past actions, favorable or unfavorable, come to fruition are indicated by planetary pos...

सोमतिती_विद्या--लक्ष्मण रेखा....

#सोमतिती_विद्या--लक्ष्मण रेखा.... महर्षि श्रृंगी कहते हैं कि एक वेदमन्त्र है--#सोमंब्रही वृत्तं रत: स्वाहा वेतु सम्भव ब्रहे वाचम प्रवाणम अग्नं ब्रहे रेत: अवस्ति,, यह वेदमंत्र #कोड है उस #सोमना कृतिक यंत्र का,, पृथ्वी और #बृहस्पति के मध्य कहीं अंतरिक्ष में वह केंद्र है जहां यंत्र को स्थित किया जाता है,, वह यंत्र जल,वायु और अग्नि के परमाणुओं को अपने अंदर सोखता है,, कोड को उल्टा कर देने पर एक खास प्रकार से अग्नि और विद्युत के परमाणुओं को वापस बाहर की तरफ धकेलता है,, जब महर्षि #भारद्वाज ऋषिमुनियों के साथ भृमण करते हुए वशिष्ठ आश्रम पहुंचे तो उन्होंने महर्षि वशिष्ठ से पूछा--राजकुमारों की शिक्षा दीक्षा कहाँ तक पहुंची है??महर्षि वशिष्ठ ने कहा कि यह जो ब्रह्मचारी राम है-इसने आग्नेयास्त्र वरुणास्त्र ब्रह्मास्त्र का संधान करना सीख लिया है,, यह #धनुर्वेद में पारंगत हुआ है महर्षि #विश्वामित्र के द्वारा,, यह जो ब्रह्मचारी #लक्ष्मण है यह एक दुर्लभ सोमतिती विद्या सीख रहा है,,उस समय पृथ्वी पर चार गुरुकुलों में वह विद्या सिखाई जाती थी,, महर्षि विश्वामित्र के गुरुकुल में,,महर्षि वशिष्ठ के गुरुकुल में,, म...

शिवस्य दशावतार ।। shastriji bhavnagar।।

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🙏जय शंकर जी🙏 दोस्तों आज हम आप को भगवान शंकर के दस अवतारों के वारे में बता रहे है  जरूर पढ़ें 📖 शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव के दस प्रमुख अवतार । 1. महाकाल- शिव के दस प्रमुख अवतारों में पहला अवतार महाकाल नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का महाकाल स्वरुप अपने भक्तों को भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला परम कल्याणी हैं। इस अवतार की शक्ति माँ महाकाली मानी जाती हैं। 2. तार- शिव के दस प्रमुख अवतारों में दूसरा अवतार तार नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का तार स्वरुप अपने भक्तों को भुक्ति- मुक्ति दोनों फल प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति तारादेवी मानी जाती हैं। 3. बाल भुवनेश- शिव के दस प्रमुख अवतारों में तीसरा अवतार बाल भुवनेश नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का बाल भुवनेश स्वरुप अपने भक्तों को सुख, समृद्धि और शांति प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति को बाला भुवनेशी माना जाता हैं। 4.षोडश श्रीविद्येश- शिव के दस प्रमुख अवतारों में चौथा अवतार षोडश श्रीविद्येश नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का षोडश श्रीविद्येश स्वरुप अपने भक्तों को सुख, भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार क...

तिलक धारण

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त्रिपुंड और तिलक ......... ललाट अर्थात माथे पर भस्म या चंदन से तीन रेखाएं बनाई जाती हैं उसे त्रिपुंड कहते हैं। भस्म या चंदन को हाथों की बीच की तीन अंगुलियों से लेकर सावधानीपूर्वक माथे पर तीन तिरछी रेखाओं जैसा आकार दिया जाता है।  शैव संप्रदाय के लोग इसे धारण करते हैं। शिवमहापुराण के अनुसार त्रिपुंड की तीन रेखाओं में से हर एक में नौ-नौ देवता निवास करते हैं। त्रिपुंड के देवताओ के नाम इस प्रकार हैं-........... 1- अकार, गार्हपत्य अग्नि, पृथ्वी, धर्म, रजोगुण, ऋग्वेद, क्रियाशक्ति, प्रात:स्वन तथा महादेव- ये त्रिपुंड की पहली रेखा के नौ देवता हैं। 2- ऊंकार, दक्षिणाग्नि, आकाश, सत्वगुण, यजुर्वेद, मध्यंदिनसवन, इच्छाशक्ति, अंतरात्मा और महेश्वर- ये त्रिपुंड की दूसरी रेखा के नौ देवता हैं। 3- मकार, आहवनीय अग्नि, परमात्मा, तमोगुण, द्युलोक, ज्ञानशक्ति, सामवेद, तृतीयसवन तथा शिव- ये त्रिपुंड की तीसरी रेखा के नौ देवता हैं। त्रिपुंड का मंत्र-ॐ त्रिलोकिनाथाय नम: तिलक के प्रकार : .......… तिलक कई प्रकार के होते हैं - मृतिका, भस्म, चंदन, रोली, सिंदूर, गोपी आदि।  सनातन धर्म में शैव, शाक्त, व...