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વિષ્ણુ સહસ્ત્ર નામ સ્તોત્ર ના અદભુત રહસ્યો..

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વિષ્ણુસહસ્ત્ર નામ સ્તોત્ર નાં અદભુત રહસ્યો !!   દ્વારકામાં હું જ્યારે સ્વામી અભેદાનંદ જી ને મળેલો ત્યારે એમણે વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ સ્તોત્રનાં કેટલાંક રહસ્યો મને બતાવેલાં.  આજે આપની સાથે એ રહસ્યો હું શેર કરું છું.  આપણે જાણીએ જ છીએ કે જન્મ એટલે કે સર્જનનો હવાલો બ્રહ્મા સંભાળે છે. જીવનનો હવાલો ભગવાન વિષ્ણુ સ્વયં સંભાળે છે જ્યારે મૃત્યુ અને વિસર્જનનો હવાલો ભગવાન શિવ સંભાળે છે.  એટલે જ્યાં સુધી જીવન છે,  જ્યાં સુધી સંસાર છે,  જ્યાં સુધી આર્થિક જરૂરિયાતો છે,  જ્યાં સુધી ભોજનની વ્યવસ્થા કરવાની હોય છે,  જ્યાં સુધી કુટુંબને પાળવાનું હોય છે  ત્યાં સુધી ભગવાન વિષ્ણુની આરાધના જરૂરી છે.  પછી તે શ્રીરામ તરીકે હોય, શ્રીકૃષ્ણ તરીકે હોય,  શ્રી સ્વામિનારાયણ ભગવાન તરીકે હોય કે પછી તિરુપતિ બાલાજી તરીકે હોય !! વિષ્ણુની ચેતના જ આ તમામ સ્વરૂપોમાં જાગૃત છે.  વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ સ્તોત્ર પાઠ ભગવાન વિષ્ણુ કે શ્રીકૃષ્ણની ઉપાસના કરવાનું એક અમોઘ સ્તોત્ર છે. આ સ્તોત્રના કેટલાક મંત્રો એકદમ સિદ્ધ મંત્રો છે અને જુદા જુદા હેતુ માટે એનું સતત નામસ્મરણ કરી શકાય છે...

रोगानुसार देसी गाय के शुद्ध घी के उपयोग

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*रोगानुसार देसी गाय के शुद्ध घी के उपयोग :-* १. गाय का घी नाक में डालने से पागलपन दूर होता है। २. गाय का घी नाक में डालने से एलर्जी खत्म हो जाती है। ३. गाय का घी नाक में डालने से लकवा का रोग में भी उपचार होता है। ४. 20-25 ग्राम गाय का घी व मिश्री खिलाने से शराब, भांग व गांजे का नशा कम हो जाता है।  ५. गाय का घी नाक में डालने से कान का पर्दा बिना ओपरेशन के ही ठीक हो जाता है। ६. नाक में घी डालने से नाक की खुश्की दूर होती है और दिमाग तरोताजा हो जाता है। ७. गाय का घी नाक में डालने से कोमा से बाहर निकल कर चेतना वापस लोट आती है। ८. गाय का घी नाक में डालने से बाल झडना समाप्त होकर नए बाल भी आने लगते है। ९. गाय के घी को नाक में डालने से मानसिक शांति मिलती है, याददाश्त तेज होती है। १०. हाथ-पॉँव मे जलन होने पर गाय के घी को तलवो में मालिश करें जलन ठीक होता है। ११. हिचकी के न रुकने पर खाली गाय का आधा चम्मच घी खाए, हिचकी स्वयं रुक जाएगी ।  १२. गाय के घी का नियमित सेवन करने से एसिडिटी व कब्ज की शिकायत कम हो जाती है। १३. गाय के घी से बल और वीर्य बढ़ता है और शारीरिक व मानसिक ताकत में...

श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन. ..,....

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श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं। इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा।   एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा- नारद- बालक तुम कौन हो ? बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ । नारद- तुम्हारे जनक कौन हैं ? बालक- यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।    तब नारद ने ध्यान धर देखा।नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि  हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मा...