सनातन धर्म एवम् ब्राह्मण उत्पत्ति ।। शास्त्री जी ।।
शास्त्री जी भावनगर
*सनातन धर्म एवं ब्राह्मणोत्पत्ति*
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⭕ सनातन धर्म के अनुसार सृष्टि के पूर्व सदाशिव ही भगवान् विष्णु के रूप में प्रकट हुए।
⭕ भगवान् विष्णु के कमलनाभि से भगवान् ब्रह्मा प्रकट हुये।
⭕ सृष्टि निर्माण हेतु भगवान् ब्रह्मा ने अपने *दशांश शक्ति* से 10 ऋषियों को 10 अलग-अलग अंगों से प्रकट किया.....
1-गोद से नारद,
2-अंगूठे से दक्ष,
3-श्वास से वसिष्ठ,
4-त्वचा से भृगु,
5-हाथ से क्रतु,
6-नाभि से पुलह,
7-कानों से पुलस्त्य,
8-मुख से अंगिरा,
9-नेत्रों से अत्रि,
और
10-मन से मरीचि उत्पन्न हुये।
👉 ये सभी ऋषि भगवान् ब्रह्मा के दशांश शक्ति के हैं। ये सभी ऋषि त्रिगुण सत्-रज-तम से निर्मित थे। ये स्वर्ग से यहाँ आकर ऋषियों द्वारा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के रूप में स्थापित किये गये। *इस समय तक लिखने की परम्परा नहीं थी।*
इस काल में ब्राह्मण *पढ़ना-पढ़ाना, यज्ञकरना-यज्ञकराना तथा दानदेना-दानलेना* का कार्य *श्रुति-स्मृति* से किया करते थे।
⭕ इसके बाद भगवान् ब्रह्मा ने सत् निर्मित प्रजा के विस्तार हेतु 4 सनकादि (सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार) को उत्पन्न किया और सतोगुणी प्रजा को उत्पन्न करने का आदेश दिया। सनकादि ने ब्रह्मचर्य रहने की इच्छा व्यक्त की, इससे भगवान् ब्रह्मा को क्रोध आ गया।
⭕ भगवान् ब्रह्मा के क्रोध से रुद्र प्रकट हुये, जिन्हें शंकर कहा जाता है। इनका विवाह सती से हुआ जो देह त्याग कर पार्वती हुईं।
⭕ इसके बाद भगवान् ब्रह्मा ने स्वर्ग के दक्षिण हिस्से को सृष्टि का न्यायालय यमलोक बनाया और ऋषि कुल में उत्पन्न सूर्य पुत्र-यम को राजा बना कर ऋषि, देव तथा दानव का न्याय करने का आदेश दिया।
यमराज ने माण्डव्य ऋषि को गलत दण्ड दे दिया जिससे क्रुद्ध होकर माण्डव्य ऋषि ने यमराज को शूद्रा के गर्भ से उत्पन्न होने का शाप दे दिया।
इससे व्यथित होकर यमराज भगवान् ब्रह्मा के पास जाकर बोले हे भगवन् आपने मुझे ८४ लाख योनि पर शासन करने के लिये नियुक्त किया है, परन्तु मैं इसको करने में सक्षम नहीं हूँ, क्योंकि ऋषि, देव तथा दानव मेरे ही शक्ति के हैं।
⭕ भगवान् ब्रह्मा ने यमराज की अक्षमता देखकर तपस्या करना प्रारम्भ किया, इसमें *भगवान् विष्णु का पालन की शक्ति, अपना जन्म देने की शक्ति एवं शंकर का संहार करने की शक्ति* को संचित किया, तो उनकी काया (सर्वांग) से एक देव प्रकट हुये, जो कलम, पत्रिका और दावत लिये हुये थे। उनको भगवान् ब्रह्मा ने *कायस्थ* और *चित्रगुप्त* का नाम दिया।
भगवान् ब्रह्मा ने भगवान् चित्रगुप्त को ऋषि, देव तथा दानवों का *दण्डाधिकारी* बनाया। भगवान् चित्रगुप्त ऋषि, देव तथा दानवों के *दण्डाधिकारी* हैं। ये *महाकाल* हैं।
इसीलिये सभी सनातनी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इत्यादि के श्राद्ध में मुक्ति के लिये भगवान् चित्रगुप्त से प्रार्थना की जाती है कि आप मेरे पितृ को मुक्ति दें। गरुडपुराण का पाठ भगवान् चित्रगुप्त को प्रसन्न करने के लिये किया जाता है।
भगवान् चित्रगुप्त ने लिपि का निर्माण किया और लिखने की परम्परा देव लोक में विकसित हुई।
*ब्राह्मण जाति का उद्भव*
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भगवान् चित्रगुप्त का विवाह कश्यप ऋषि के पौत्र वैवस्वतमनु की ४ कन्याओं तथा नागर ब्राह्मण की ८ कन्याओं से हुआ। इन ऋषिपुत्रियों से १२ पुत्र उत्पन्न हुये।
भगवान् ब्रह्मा भगवान् चित्रगुप्त के १२ पुत्र को लेकर स्वर्ग से मृत्यु लोक में लाये जो अपने पिता के समान लिखने की परम्परा के ज्ञाता थे।
भगवान् चित्रगुप्त के पुत्रों को भगवान् ब्रह्मा ने १२ ऋषियों को देकर उनसे कहा कि ये चित्रगुप्त के पुत्रों को यहाँ की विधा सुना दो, ये लिख देंगे।
ऋषियों ने भगवान् चित्रगुप्त के पुत्रों को यहाँ की विधा सुना दी, जिसे सुनकर भगवान् चित्रगुप्त के पुत्रों ने लिखकर सुरक्षित रख लिया। भगवान् चित्रगुप्त के १२ पुत्र *गौडब्राह्मण* के नाम से जाने गये। *लिखने की परम्परा चित्रगुप्त के पुत्रों द्वारा विकसित हुई।*
*गौडाश्च द्वादश प्रोक्ता: कायस्थास्तावदेवहि।*
*अर्थ:-* गौडब्राह्मण १२ प्रकार के बताये गये हैं, उन्हें ही कालान्तर में कायस्थ जानें।
*वेद-पुराण* लिखने वाले *व्यास* या तो चित्रगुप्त वंशीय थे अथवा भगवान् चित्रगुप्त के पुत्रों से शिक्षित थे।
इसके बाद भगवान् चित्रगुप्त के पुत्रों ने १२ ऋषि पुत्रों को लिखना सिखाया। जो मालवीय, श्रीगौड, गंगापुत्र, हर्याणा, वाल्मीकि, वसिष्ठ, सौरभ, दालभ्य, सुखसेन, भट्ट, सूर्यध्वज तथा माथुर नाम से जाने जाते हैं। ये चित्रगुप्त वंशीय गौडब्राह्मणों के नाम से ही गौडब्राह्मण कहे जाते हैं।
कालांतर में यही ऋषि ब्राह्मण-सरस्वती नदी पर बस कर *सारस्वत,* कन्नौज में बस कर *कान्यकुब्ज,* सरयू तट पर बस कर *सरयूपारीण,* मिथिला में बसकर *मैथिल* तथा उत्कल देश में बसकर *उत्कल* कहलाये।
ये ब्राह्मण कायस्थों के साथ अस्तित्व में आये *ऋषि गौडब्राह्मण* ही हैं।
*कायस्थों को हटा कर ऋषि ब्राह्मणों की व्याख्या अधूरी है।*
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*संदर्भ :- श्रीमद्भागवत पुराण एवं पद्मपुराण।*
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शास्त्री जी भावनगर
९५१०७१३८३८
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